दीपावली क्यों मानते है

दीवाली भारत के सबसे बड़े और प्रतिभाशाली त्योहार में से एक है। यह त्योहार आध्यात्मिक रूप से अंधकार पर प्रकाश की विजय को दर्शाता है। इस त्योहार को दीपोत्सव के नाम से भी जाना जा सकता है, क्योकि इस दिन लोग अपने घरो में दीप जलाते है। इस त्योहार को हिन्दू धर्म के लोगो के अलावा इसे सिख, बौद्ध तथा जैन धर्म के लोग भी मनाते हैं। इस वर्ष दिवाली 7 नवंबर 2018 को है

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हिन्दू धर्म के मान्यता के अनुसार अयोध्या के राजा श्री रामचंद्र अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात लौटे थे। अयोध्या लौटने पर उनके स्वागत में लोगो में अपने घरो में घी के दीये जलाये थे और तब से ये प्रथा आज तक चली आ रही है। ग्रिगेरियन कैलन्डर के अनुसार यह त्योहार अक्टूबर या नवंबर महीने में पड़ता है।

यह त्योहार असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक है।

यह स्वच्छता व प्रकाश का पर्व है। कई सप्ताह पूर्व ही दीपावली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती है। लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई का कार्य करते हैं। घरों में मरम्मत, रंग-रोगन, सफ़ेदी आदि का कार्य होने लगता हैं। लोग दुकानों को भी साफ़ सुथरा कर सजाते हैं। बाज़ारों में गलियों को भी सुनहरी झंडियों से सजाया जाता है। दीपावली से पहले ही घर-मोहल्ले, बाज़ार सब साफ-सुथरे व सजे-धजे नज़र आते हैं।

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आज के ही दिन लोग भगवान राम उनके भाई लक्ष्मण तथा पत्नी माता सीता के साथ-साथ धन की देवी माता लक्ष्मी था भगवान गणेश की पूजा करते है, तथा ये मंगल कामना करते है की आने वाला समय खुशियो तथा समृद्धि से भरा हो।

 

समय के साथ-साथ इसे मनाने के तरीके में भी बदलाव आया है, पहले लोग घी के दीप जलाते, एक दूसरे को उपहार देते तथा ईश्वर से मंगल कामना करते। आज लोग इन सभी के साथ कुछ और चीजे जोड़ दी जैसे घी के दीपो के साथ-साथ मोमबत्ती जलना, बिजली के रंग बिरंगे बल्ब से रौशनी फैलाना, पटके जलना इत्यादि। कुल मिला कर अगर बोला जाए तो आज भी लोग इसे उसी हर्ष और उल्लाश साथ मानते है जिस हर्ष और उल्लाश के साथ अयोध्यावासियों ने अपने परम प्रिये राजा राम के स्वागत में पहेली बार घी के दीये जलाये थे।